चिकटराज देव मेला: आस्था, परंपरा और आदिवासी शासन व्यवस्था का अनूठा संगम,
“देव मिलन” की परंपरा: गांव-गांव से देवी-देवताओं का आगमन, ढोल-नगाड़ों के बीच अद्भुत संगम

बीजापुर।बीजापुर के आदिवासी अंचल में आस्था, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है, जहां सिर्फ मेला नहीं लगता बल्कि देवी-देवताओं की “सभा” होती है,बीजापुर मे चिकटराज देव के प्रसिद्ध मेला के जहां सैकड़ों साल पुरानी परंपराएं आज भी जीवित हैं. बीजापुर नगर में आयोजित होने वाला चिकटराज देव मेला आदिवासी संस्कृति की गहरी जड़ों को दर्शाता है. इस मेले की सबसे खास बात यह है कि यहां आसपास के गांवों के देवी-देवताओं को विधिवत आमंत्रित किया जाता है.गांव-गांव से देवता ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मेला स्थल पहुंचते हैं.इसे स्थानीय भाषा में “देव मिलन” कहा जाता है.
मेला शुरू होने से पहले एक खास परंपरा निभाई जाती है. जिसमें गांव के मांझी, पटेल, पुजारी और गुनिया मिलकर व्यवस्था और “कोष” की समीक्षा करते हैं.यह किसी सरकारी प्रक्रिया की तरह नहीं बल्कि सदियों पुरानी आदिवासी शासन प्रणाली का हिस्सा है.जिसमें चढ़ावा,पूजा और पूरे आयोजन की जिम्मेदारियों का बंटवारा किया जाता है.
इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा बस्तर रियासत काल से चली आ रही है. जब देवी-देवताओं को एक मंच पर लाकर सामाजिक और धार्मिक फैसले लिए जाते थे.चिकटराज देव को क्षेत्र का आराध्य देव माना जाता है और मान्यता है कि उनके दरबार में हर मुराद पूरी होती है. यही वजह है कि हर साल हजारों श्रद्धालु इस मेले में शामिल होते हैं.




